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    संगठन अवधारणा,आवश्यकता और सीमा

    संगठन अवधारणा,आवश्यकता और सीमा
    8 July

    वर्तमान नागरिक संहिता में आप चारों और सुनते हैं-‘संगठन से जुड़ें,संगठन से जुड़े रहें,संगठन से जुड़ने में फायदा है।’ आदि-आदि अर्थात् संगठन के लाभ के बारे में बताया जाता है,और संगठन में रहने को कहा जाता है। बहुत समय से इस बात पर मंथन कर रहा हूँ कि,संगठन की अवधारणा क्या है ? इसकी सीमा क्या है ? और किसको इसकी आवश्यकता है,और कितनी ?
    वर्तमान समय में कार्य कैसे संपादित होते हैं,यह कार्य से जुड़ा हुआ व्यक्ति अच्छी तरह जानता है। इस समय ऐसा लगता है काश कोई हमारे पीछे होता तो अपना भी काम बन जाता। दूसरा सुप्रसिद्ध उक्ति हैै-“संघे शक्ति: कलौयुगे” अर्थात् कलियुग में संगठन में शक्ति है। इस प्रकार स्पष्ट है कि वर्तमान में शक्ति संगठन के अधीन है। अतः संगठन में रहना फायदे का सौदा है। अब जानते हैं कि,क्या सभी के लिए संगठन फायदे का सौदा है ? दूसरा प्रश्न संगठन से कब जुड़ना चाहिए ? संगठन से कब दूर रहना चाहिए? मेरा अपना सुझाव है कि,छात्रों खासकर प्रगतिशील छात्रों को संगठन से दूर रहना चाहिए। जिन छात्रों में निर्माण की सम्भावना अधिक हो,जिनकी बुद्धि कोमल हो अपरिपक्व हो,जो अभी विकास के पथ पर अग्रसर हैं,जिसे पर्याप्त मार्गदर्शन मिल रहा हो,जिसके पास विवेक जागरण का निर्बाध अवसर हो अथवा सारांश में प्रायः ब्रह्मचर्यावस्था वाले छात्र को यथासंभव संगठन या सांगठनिक विचारधारा से दूर रहना चाहिए। अन्यथा बुद्धि के कुण्ठित होने या विवेक भ्रष्ट हो जाने का ख़तरा बना रहता है। छात्र जीवन एक ऐसा जीवन होता है,जिसमें आप अपना निर्माण करते हैंl यदि आपके निर्माण की प्रक्रिया गतिमान है अर्थात् आपके पास अपने विकास की समुचित व्यवस्थाएं हैं और इन व्यवस्थाओं से आप अपना विकास कर सकते हैं तो आपको संगठन से दूर रहना चाहिए,अन्यथा संगठन की मोहमयी अवधारणा आपकी वास्तविक शक्ति का जागरण नहीं कर पाएगीl कुछ का शायद कर भी दे,परंतु सभी का असंभव है। क्या संगठन के कुछ विपरीत प्रभाव हैं ? हाँ,संगठन के कुछ विपरीत प्रभाव भी हैंl संगठन में आपको सामूहिकता का ध्यान रखना होता हैl कभी-कभी सही बात संगठन के लिए गलत हो सकती है परंतु व्यक्तिगत तौर पर आपके लिए सही। सही बात से बढ़कर आपके लिए कोई बात नहीं हो सकती। ऐसी अवस्था में आप संगठन की बात मानने के लिए बाध्य हो जाते हैं और यदि आप संगठन की बात नहीं मानते,तो संगठन आपको दूध में गिरी मक्खी की तरह उठाकर फेंक सकता है या संगठन में आपका तिरस्कार या उपेक्षा प्रारम्भ हो सकती है जो अत्यंत कष्टकारी होता है। संगठन में सही-गलत का संतुलन और जी हजूरी का चलन यह दोनों महत्वपूर्ण विपरीत प्रभाव हैं। इनसे बचने के लिए क्या करना चाहिए ? इनसे बचने का एक ही उपाय है कि,संगठन से जुड़े रहते हुए आप समानांतर रुप से व्यक्तिगत शक्ति का विकास करते रहें,ताकि यदि संगठन आपका तिरस्कार करता है तो आप उसके प्रतिरोध के लिए सक्षम हो सकें। संगठन से फायदा हो,इसके लिए क्या करना चाहिए ? संगठन वर्तमान में बहुत लाभदायक है,इससे लाभ लेने के लिए आपको संगठन के साथ और अपनी नीतियों के साथ,अपनी आवश्यकताओं के साथ जबरदस्त तालमेल बिठाए रखना होगा,अन्यथा आप संगठन की भीड़ में खो सकते हैंl चलिए बात करते हैं पहले बिंदु पर-पहले बिंदु पर मेरा कहना है संगठन उन लोगों के लिए फायदे का सौदा है जो परिपक्व हो चुके हैं अर्थात २५ की उम्र के बाद वाले लोगों के लिए संगठन फायदे का सौदा है,परंतु २५ की उम्र से कम के लिए संगठन बहुत अच्छा नहीं हैl दूसरा प्रश्न था संगठन से कब जुड़ना चाहिए-संगठन से तब जुड़ना चाहिए,जब २५ साल की आयु पूर्ण हो चुकी हो और आपके अंदर नेतृत्व की क्षमता हो अथवा आपको यह पता हो कि मैं अकेला कुछ नहीं हूँ,मैं बहुत प्रभावी नहीं हूँ,मुझे सहारे की आवश्यकता है। यहां ध्यान दिलाना चाहूंगा कि व्यक्ति को अपने अंदर सामर्थ्य अर्जित करनी चाहिए,जिससे वह इतना सामर्थ्यशाली हो सके कि उसे किसी की आवश्यकता ही ना हो अथवा वह नेतृत्व करे,अन्यथा संगठन ऐसे लोगों का अपने लिए प्रयोग करता है। हो सकता है इसमें व्यक्ति को लाभ मिले और मिलता भी है,परंतु बिना व्यक्तिगत योग्यता के वह अपना रास्ता नहीं बना सकताl वह संगठन में केवल एक कठपुतली रहता है,जो अपना काम भी करवाता है और संगठन के लिए काम भी करता है। अपनी मजबूरी के कारण,क्योंकि वह जानता है मैं अकेला कुछ नहींl



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