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    मैं कौन?
    8 July

    मुझसे कहा जाता है कि मैं उग्र हो जाता हूँ, कानूनी कदम उठा देता हूँ, जबकि ऐसा नहीं है । ये अधूरा सच है, मैं सबसे पहले विनय करता हूँ, प्रार्थना करता हूँ, अपने दिल की बातें समझाता हूँ, परिस्थितियाँ खोल देता हूँ और हमेशा मैंने यही किया । मैं हर एक चौखट पर अपने दिल की व्यथा कह कर आया सबको समझाया भी (हाँ कभी चरणचुम्बन नहीं किया) किंतु किसी ने भी नहीं सुनी, न निवेदन स्वीकार किया, न कर्तव्य निर्वाह। मुझे सुनाया तो जाता है, वो भी कुछ लोगों के सामने गवाह बनाकर किन्तु मेरी कभी सुनी नहीं जाती, और मैं कुछ कह भी नहीं सकता जब तक स्थिति ऐसी न हो कि मैं जो कहना चाहता हूँ वो उसी रूप में सुना भी जाय, यहाँ तो सुनकर मन में कुछ बुन लिया जाता है, बताया भी नहीं जाता, और बोलने का रिकॉर्ड भी हो जाता है (तूने ये बोला था), फिर कैसे अपना हृदय खोल दें। अनुकूलता तो हो। मेरी उग्रता तो सबको दिख जाती है, परंतु तपस्या नहीं, धैर्य नहीं, हो सकता है मैं करता ही नहीं हूँ । पर कुछ तो करता हूँ । तभी तो लहरें पैदा होती हैं, खैर! मैंने कई बार कहा भी है कि आखिर धैर्य की सीमा क्या है? लेकिन कभी किसी ने समझा ही नहीं। किसी ने समस्याओं के समाधान के लिए पहल की ही नहीं । फिर इस अवस्था में न पहुंचते तो कहां पहुंचते । कभी विचार कीजिएगा फुर्सत मिले तो । आप अपने मन तक तो पहुंच सकते हैं । किंन्तु बिना चाहे मेरे मन तक नहीं, और मैं एक तुच्छ बालक हूँ इसलिए कोई चाहत क्यों करेगा । आपका आप जानते हैं लेकिन मेरा मैं जानता हूँ और सिर्फ मैं जानता हूँ। मेरे कर्म और मन तक पहुंचने की कोशिश कीजिएगा कभी, चाहत हो तो। कर्म खुले हुए हैं। वहां से मन का रास्ता भी है। देख लीजिए और पहुंच जाइए। आपको सब उत्तर मिल जाएंगे। बाकी आपके द्वारा मुझे जैसा परिभाषित करना हो आप कर सकते हैं आप अपनी बुद्धि (धारणा) बनाने के लिए स्वतंत्र हैं । मैं किसी को नहीं रोकता।और मैं केवल कर्तव्य करने के लिए स्वतंत्र हूँ। शायद अभी सब मेरे विपरीत दिखें। किन्तु कभी तो कुछ यथावत दिखेगा। सबसे बड़ा साथी समय होता है और दुश्मन भी। अपने दर्पण में सारे परिणाम समाज को दिखाएगा, और ज़िंदा रहा तो समय स्वयं मुझे अवसर देगा । अभी मैं वही केवल करता हूँ जो मेरे दायरे में है। और जहाँ बंधन प्रभाव नहीं डाल पाता।
    मैं जानता हूँ वर्तमान दशा में मेरा भला नहीं हो सकता, क्योंकि अगर कोई मेरा भला करने वाला होता तो मैं इस दशा में पहुँचता ही नहीं, और अकेले जो मेरी अधीन है उसके करने में तो मैं तब तक रुक रहा हूँ जब तक मेरे मन में रिश्तों की कद्र है। वरना किसी भी पराये की इतनी औकात नहीं जो मुझे इतना व्यर्थ में परेशान कर सके। और बिना बंधनों के जो मेरे अधीन है उसे तो भगवान भी नहीं छीन सकते ।

    एक सामाजिक प्राणी जब अकेला होता है तो उसे समस्याओं के समाधान हेतु क्या करना चाहिए यह भी चिंतनीय है।
    02/05/2019



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