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    लेखनी का उपदेश

    लेखनी का उपदेश
    8 July

    गर्दिश में थे,लेखनी चिल्ला उठी चुप ना रहो,
    जो है तुम्हारे पास में,लिखते रहो,लिखते रहो।
    लिखते रहोगे,तो तुम्हारी लेखनी मज़बूत होगी,
    जब समय होगा तुम्हारा,साथ यह भरपूर देगी।
    क्या उचित है ? क्या अनुचित ? लिखने से ही ज्ञात होगा,
    और लिखने से ही तेरे दूर मन का ताप होगा।
    संचित विचारों की ये गठरी,खोलेगा यदि तू नहीं,
    सोच ले फिर नवविचारों का सर्जन होगा नहीं।
    माना कि ये मुश्किल घड़ी है,साथ कोई भी नहीं है,
    पर न तुम चुप बैठ जाना,खुद की ताकत आज़माना।
    जब कभी कोहरा छंटेगा,काम फिर ये आएगा,
    फिर तुम्हारी योग्यता का ओज बढ़ता जाएगा।
    चंचल समय है,एक दिन तेरा भी निश्चित आएगा,
    आज जो तुझ पर है भारी,देखता रह जाएगा।
    हारकर चुप बैठकर,तुझको मिलेगा कुछ नहीं,
    और यदि लिखता रहेगा,भाग्य बदलेगा यही।
    ऊँगली उठाएंगे सभी,पर नीति ना समझाएंगे,
    तू गलत,तू ही गलत,बस बोलते यह जाएंगे।
    कैसे गलत हूँ ? पूछेगा,उत्तर मिलेगा ही नहीं,
    और जो कुछ तर्क देगा,वो सुनेगा ही नहीं।
    श्रद्धा कभी,आदर्श भी पथ रोकने को आएंगे,
    हौंसला देंगे नहीं,बस द्वंद्व में उलझाएंगे।
    ऐसे समय कर्तव्य ही अपना निभाना तू सखे,
    द्वन्द्व के इस प्रश्न को तुम छोड़ जाना हे सखे।
    जब समय अनुकूल होगा,द्वन्द्व भी निर्मूल होगा,
    और जो मन का भरम है,क्षण में वह भी दूर होगा
    सही-गलत की चिंता में तुम अपने को यूँ मत खोना,
    साथ कोई देगा ही नहीं,तुम आशा में भी मत रहना।
    कड़ी धूप में साया भी चुपचाप छोड़कर जाता है,
    मात्र हौंसला मानव का उसको मंज़िल दिलवाता है।
    तुझको तेरा अनुभव ही बस मार्ग बताता जाएगा,
    जो है तुझमें वह बिखरा दे,जग तेरा महकाएगा॥
    रचनाकार-कुलदीप गौड़ “जिज्ञासु”



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