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    तेरा चेहरा, मेरी बेबसी

    तेरा चेहरा, मेरी बेबसी
    8 July

    जब भी तुझे देखता हूँ, पता नहीं क्यों बैचैन हो जाता हूँ, सोचता हूँ कोई गीत ही लिख दूँ तुझ पर, तेरी भोली सी सूरत पर, तेरी आँखों पर, तेरे सुर्ख होंठो पर, या तेरी बेरुखी ही लिख दूँ, या अपने दिल की टूटन लिख दूँ, या लिख दूँ मुझ में घुली हुई तेरी सांसे, जो भी हो बस लिख दूँ, इसी सोच में सभी प्यारे-प्यारे दिलकश शब्दों को बुलाता हूँ, उन्हें मनाता हूँ, अपनी गीत की प्रीत की माला में जुड़ने को कहता हूँ। मगर ये भी बेवफा हैं, रूठ गए हैं। कहते हैं लय और संगीत भी तुझसे रूठे हैं, उन्हें भी मना नहीं पा रहा हू। सुना है वो तेरी आँखों और होंठो पर तैर रहे हैं। कैद हुए पड़े हैं। इसलिये कुछ शब्दों के सहारे बिना लय संगीत के ये एक लफ्जों का जाल लिख गया।



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