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    कवितायें

    वो डायरी कहीं खो गयी

    वो डायरी कहीं खो गयी
    8 July

    वो डायरी कहीं खो गयी

    जिसमे कभी अपनी तन्हाई के भाव निचोड़े थे मैंने,

    बड़ी मुश्किल से अपने दिल का हाल बयां कर पाया था जिन शब्दों में,

    अपना भूत भविष्य वर्तमान जिसमें समाया था कभी,

    जिसमें मेरे सपने मेरे आदर्श पिरोये थे मैंने,

    वो डायरी आज कहीं खो गयी ।।


    अपनी गलती अपनी शक्ति जिसमे दिखती थी मुझको,

    अपनी कविता अपने गीत जिसमे लिखने थे मुझको,

    वो डायरी कहीं खो गयी ।।


    उसके जाने से बड़ा उदास हूँ आज

    लगता जैसे कोई विकलांग हूँ आज

    शायद उसके मिलने की कोई उम्मीद नहीं

    पर उम्मीद के सिवा मुझमे कोई तरकीब नहीं

    कहीं मिल जाये ज़रूर बताना यारों

    वो डायरी जो कहीं खो गयी ।।


    शब्दों में भाव निचोड़ने की ताकत तो नहीं मगर,

    कभी कभी जब भावसमुद्र में डूबे रहते हैं,

    तो शब्द कभी कभी स्वयं भाव बनकर अंकित हो जाते हैं,

    लेकिन ऐसे क्षण कम ही जीवन में आते हैं,

    और जब आते हैं तो बड़ी हसींन याद देकर जाते हैं ।

    यही भाव कभी अपनी कविता में पिरोये थे,

    और उस कविता को अपनी डायरी में लिखा था,

    वो डायरी आज कहीं खो गयी।।


    क्या तुम्हे अनुमान है ?

    कितना आघात लगा है मुझे उसके जाने से

    शायद उसको भी मैं लफ़्ज़ों में बयां न कर पाऊँ

    पर सहृदय बनकर सोचो ज़रा

    क्या गुज़र रही है मुझ पर, उसके जाने से,

    वो डायरी जो कहीं खो गयी ।।


    कहीं मिले तो बताना ज़रूर

    कहीं दिखे तो बताना हुज़ूर

    चाहे वो है कितनी भी दूर

    कर गयी मेरे दिल को मजबूर।।


    ये सब लिखने को .........

    #उदासी #स्वानुभूति

    #निजाक्षर✍

    #कुलदीपगौडजिज्ञासु

    जुलाई 2017



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