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    पीड़ा के स्वर
    25 April

    क्या कर लोगे मेरी पीड़ा जानकर

    (https://youtu.be/Q9rMSUEzOyw)ऑडियो/वीडियो में सुनें

    क्या इस पीड़ा से मुक्ति का कोई ऐसा उपाय बता सकते हो जिसमें पलायन भी न करना पड़े, मेरी सम्भावनाओं की हत्या भी न हो और मैं स्वस्थ और प्रसन्न भी रहूँ?

    यही चुनौती है मेरी पीड़ा की, मेरी पीड़ा कुछ अलौकिक है। शायद!

    क्योंकि मैं पलायन करके नही दुखों से दो-दो हाथ कर निकलना चाहता हूँ।

    लेकिन इसकी चुनौतियों और निष्कर्ष को किस्मत का नाम नहीं बल्कि कर्म की परिणिति के रूप में व्यक्त करना चाहता हूँ।

    क्या तुम स्वीकार कर सकोगे?

    या फ़िर ये कहकर निकल जाओगे कि ऐसा नहीं होता,

    या फ़िर सारी बातें किस्मत की दहलीज पे छोड़कर चले जाओगे, और किस्मत भी ऐसी जिसमें कर्मों का सच न हो।

    या फ़िर या कह कर पिण्ड छुड़ाओगे कि और भी तो लोग हैं दुनिया में, जो दुखी हैं।

    या फ़िर ये समझाओगे कि जिनका उदहारण तुम दे रहे हो उनमें और मेरे मे क्या समानता है क्या सम्भावना है। या इस बात पर मुझे निराशावादी कहकर मुँह फेर लोगे।

    या ये कहोगे तुम ध्यान मत दो।

    क्या समझा सकते हो कैसे ध्यान न दूँ।

    क्या तुम मुझे समझकर फ़िर उपदेश दे सकते हो।

    यदि हाँ तो आप मेरे मनमीत हैं, अन्यथा आपकी अच्छी बातें मधुर सन्गीत हैं, और आपका उलाहना ध्वनिमात्र है। हो सकता है मेरी बर्बादी इसका परिणाम हो मगर इस डर से मैं अपनी सम्भावना को जिन्दा रखने के लिये दुख का सामना न करुँ क्या ये सही बात है?

    कुलदीप गौड़ "जिज्ञासु"

    23 अप्रैल 2020



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