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    परंपरागत संस्कृत में अध्यापकीय क्षेत्र में रोजगार के अवसरों पर लगे कलंकों का दिग्दर्शन- व संभावनाएं

    परंपरागत संस्कृत में अध्यापकीय क्षेत्र में रोजगार के अवसरों पर लगे कलंकों का दिग्दर्शन- व संभावनाएं
    30 October

    परंपरागत संस्कृत में अध्यापकीय क्षेत्र में रोजगार के अवसरों पर लगे कलंकों का दिग्दर्शन- व संभावनाएं
    #1 सन् 2015 में डिग्री कॉलेजों में निकली संविदा पदों की भर्ती में अचानक से आचार्य उपाधि धारकों को बाहर कर दिया गया था, जो कि अभी गतिमान स्थाई भर्ती में निर्णायक साबित होने वाला है, कुछ प्रभावित न्यायालय भी गए लेकिन न्याय आज तक नहीं मिला सभी ठगे गए और संस्कृत छात्रों का हौसला टूटा सो अलग।
    #2- 2018 की लोकसेवा आयोग की प्रबक्त हिंदी हेतु विज्ञप्ति में भी परंपरागत संस्कृत छात्रों को बाहर कर दिया गया, इसके लिए भी संघर्ष किया गया चूंकि समय पर और सही जगह संघर्ष किया गया था तो सफलता मिली और usvv के परम्परागत छात्रों का भला हुआ और आज छात्र आजीविका पा रहे हैं, एकजुटता का अभाव था तो साथ न देने वाले उदासीन छात्रों को नुकसान भी हुआ जो बाद में उलाहने देते रहे। श्रेयलोभ की राजनीती चरम पर रही।

    #3- 2019 में पुनः 2018 की लोकसेवा आयोग की भर्ती में परंपरागत संस्कृत के छात्रों को अंतिम समय में बाहर कर दिया गया। खूब राजनीती हुई, वैमनस्य पैदा हुआ, प्रभावित न्यायालय भी गए लेकिन फल- #शून्य , परंपरागत संस्कृत घुटनों पर आ गयी कोई छात्र शास्त्री आचार्य नहीं करना चाहता, शास्त्री आचार्य को संदेह की नज़र से देखा जाने लगा। शायद अभी पदों पर बैठे लोगों को पद का मद चढ़ा है, लेकिन ....
    न्यायालय का निर्णय अभी भी अप्राप्त है इस केश में हुआ क्या किसी को नहीं पता। इस पर कई लोग मुझसे पूछते हैं कि इस पर क्या होगा, क्या कोई सम्भावना है। तो मैं मंदमतिक यही कहता था कि इस पर वो होगा जो प्रभावित करेंगे लेकिन शायद प्रभावितों की संघर्ष की गाड़ी में तेल ख़त्म हो गया था।
    इस पर मेरा अपना अभिमत है कि आयोग ने 31 अभ्यर्थियों को बाहर किया है जो कि अपने ही निर्णय का विरोध है । इस तरह-  इन्ही नियम और शर्तों के साथ (एक शब्द भी नहीं बदला गया था) 2015 में भी लोकसेवा आयोग द्वारा विज्ञापन किया गया था, और तब भी आचार्य उपाधि धारक छात्रों ने आवेदन किया था और निर्धारित प्रक्रिया से चयनित हुए थे और आज नियुक्ति पाकर आजीविकानिर्वाह कर रहे है जब तत्काल में अर्हता थी तो अचानक बिना किसी पूर्वसूचना के उसी डिग्री को कैसे अमान्य किया जा सकता है? (यह तथ्य मैं अपने यूट्यूब पर उपलब्ध वीडियो और पूर्व आलेख में बता चुका हूँ।) अतः स्पष्ट है कि आयोग द्वारा अन्याय किया गया है, यह सही है कि आयोग ने अपने बचाव के लिए उक्त 31 अभ्यर्थियों को अपना पक्ष रखने का अवसर दिया था, जिसमे दुर्भाग्य से कोई भी अभ्यर्थी सटीक पक्ष नहीं रख पाया, सबने एक दूसरे की नक़ल कर दी, विवेक का प्रयोग नहीं किया। जिससे आयोग को अपने बचाव का हथियार मिल गया। लेकिन फिर भी मामला उच्च न्यायालय में है और इन्ही तथ्यों के साथ यदि लड़ाई लड़ी जाय और जीत जाय तो भी नियुक्ति मिल सकती है।
    अब कोई यह कह सकता है कि विज्ञापित पदों पर तो नियुक्ति हो चुकी है अब क्या हो सकता है।
    तो इस पर उत्तर यही है कि नियुक्ति हो जाने से क्या न्याय नहीं मिलेगा? अवश्य मिलेगा आयोग को देना पड़ेगा! यदि प्रभावित न्यायालय से जीत जाते हैं तो आयोग को साक्षात्कार कराना पड़ेगा और प्रति 3 में 1 को अर्थां 8 लोगों को और नियुक्ति देनी ही पड़ेगी । कैसे देगी यह यह आयोग और उत्तराखंड सरकार की ज़िम्मेदारी है। अब बात यह है कि दम है तो छीन ले अपना हक अवसर स्वर्णिम है! और भी स्वर्णिम होगा जब यह काम यथायोग्य समय पर हो जाय।

    इस लेखन का उद्देश्य- कई दिनों से इस मामले पर विचार गतिमान था मेरे दोस्त चर्चा कर रहे थे। मैं भी सोच देख रहा था संस्कृतज्ञों का हाल। सोच रहा था जब यह नियुक्ति हो रही थी तब तो कितना जोश था, पर जैसे ही साथियों की नियुक्ति हुई सब शांत सब चुप! ......... पहला तो अपना संघर्ष बिना निर्णय निकाले रोकना क्यों? दूसरा माना कि आयोग में संभावनाएं ख़त्म हो गयी लेकिन क्या सभी जगह ख़त्म हो गयी? अरे उत्तराखंड के परंपरागत संस्कृत विद्यालयों में लगभग सभी पद खाली हैं उनमें भी तो नियुक्ति निकाली जा सकती है? आप स्वयं विचार करें। बिना आवाज उठाये ये नियुक्तियां निकलेंगी नहीं, क्योंकि सब यहाँ अपना #जुगाड़ लगाने में तल्लीन हैं। और अगर आज ये नियुक्तियां न निकली तो आपकी उम्र ढल जायेगी आपके जोश को ग्रहण लग जायेगा, पारिवारिक ज़िम्मेदारियाँ जकड़ लेंगी तो सारी उम्र डिग्री लेकर केवल पश्चाताप के आंसू ही बचेंगे। #समय के साथ ही फल की सार्थकता होती है ।
    इस संबंध की सहायता के लिए आप मुझसे संपर्क कर सकते हैं, अपने में विश्वसनीयता लेकर।
    इसके लिए आप चाहें तो एक संगठन का निर्माण भी कर सकते हैं। सहायता के लिए कई लोग तैयार बैठे हैं। साहस तो कीजिये।

    एक नज़र इस पर भी👇👇👇 कोशिश करें समझने की
    #संस्कृतहितचिंतक
    आपका अपना
    कुलदीप गौड़ जिज्ञासु



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