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    पहाड़, पलायन, परेशानी

    पहाड़, पलायन, परेशानी
    8 July

    आजकल मै घर पर हूं लेकिन गाँव के अकेलेपन के कारण चिन्तनप्रक्रियारत हूं । हमारे १० साल पहले हमारे गाँव में लगभग ४०-४५ परोवार थे परन्तु वर्तमान में मात्र २०-०५ परिवार ही रह गये हैं वो भी २-३ अथवा ४ सदस्यों वाले । अब गाँव में पहले जैसी रौनक नहीं रही । न सामूहिकता और ना ही उत्सवप्रियता । एकाकी जीवन हो गया है सबका । अच्छा किसी को नहीं लग रहा परन्तु एक अनैच्छिक स्वीकृति से सभी एकाकी जीवन जी रहे हैं । किसी को दूसरे से मतलब नहीं रहा सब अपना भविष्य विचार रहे हैं । करें भी क्या एक मज़बूरी की सी चादर ओढे हैं सब जिसके तले सबको सोना पड़ रहा है । अपना सोचता हूँ तो खुद को भी गाँव से दूर पाता हूँ वैसे भी मेरा अब तक का आधा जीवन तो जीवन ही परदेश में बीता है फिर भी गाँव के लिए फि़क्रमन्द हूँ ।

    ऎसी परिस्थिति के कारण पर विचार करता हूँ कि तो पाता हूँ कि यहाँ रोजगार व सरल जीवन की कमी है इसलिए यह दशा है । सभी लोग रोजगार की तलाश घर से बाहर निकलते हैं और अन्ततः परदेशी ही हो जाते है । गाँव बंजर सूना वीरान ।

    समाधान भी सोच रहा हूं -

    मुझे लगता है यदि सरकार इस पलायन को रोकने के लिए ठोस कदम उठाये तो गाँवों में वह रौनक और खुशहाली पुनः लौट सकती है जिसकी हर व्यक्ति के मन में चाह है वैसे भी यहां का सुरम्य वातावरण सभी को यहाँ ठहरने के लिए आमन्त्रित करता ही रहता है । सरकार के उन ठोस कदमों में यदि कुछ मोल चुकाना भी पड़े तो वह दूरगामी सुख के लिए उचित ही होगा । सर्वप्रथम सरकार को यहाँ औद्योगिक विकास की योजना तैयार करनी चाहिए यह आसान नहीं है परन्तु यदि दृढइच्छाशक्ति हो और मानवीय बुद्धि की क्षमता का सदुपयोग किया जाय तो असंभव भी नहीं । यदि यहां उद्योग लगते हैं तो अवश्य ही यातायात की समुचित व्यवस्था भी होगी । मुनाफ़ा कमाने वाली कम्पनियां अपने उत्पाद/कच्चे माल के आयात निर्यात हेतु इसमें अपना भी योगदान देगी जो कि सरकार के लिए भी लाभकारी ही होगा । यहां चिकित्सालयों की स्थापना हो । विद्यालयों विश्वविद्यालयों की समुचित स्थापना द्वारा भी अपने पहाड़ को जनशून्य होने से बचाया जा सकता हैं । अपने पहाड़ की संस्कृति भी पलायन रुकने से बचेगी। जो कि अपने में में एक अलग स्थान बनाये हुए है और पलायन के कारण पहाड़ी लोगों के शहर में आ जाने के कारण व पाश्चात्य संस्कृति की तरफ़ भागने के कारण अपनी अस्मिता को खोती जा रही है । कल्पना करें यदि सभी सुविधायें हमारे पहाड़ में हो जायें तो कैसा होगा अपने पहाड़ का जनजीवन ।

    लिखना तो बहुत कुछ चाहता हूँ परन्तु लेखन में अन्तराल आ जाने के कारण विचारश्रृङ्खला व कल्पनाश्रृङ्खला टूट रही है ।


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    १ सितंबर २०१६

     लेखक व विचारक

    पाठकाशीषाभिलाषी

    कुलदीप गौड़ “जिज्ञासु”



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