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    कवितायें

    मैं कौन हूँ? मैं क्यों हूँ?

    मैं कौन हूँ? मैं क्यों हूँ?
    2 July

    मैं कौन हूँ? मैं कौन हूँ? मैं कौन हूँ? मैं कौन?

    पूछता हूँ अपने मन से इन दिनों हो मौन।

    किसलिए हूँ क्यों हूँ आखिर बंधनों में रोज,

    तोड़ दूँ क्या बन्धनों को खोल अपना रोष।।१।।


    मौत भी मुझको चिढाती और मेरा तन जलाती,

    और खुशियाँ पास में जो रोज़ ही हैं तिलमिलाती।

    और मैं बलिदान के पथ पर बढ़ा ही जा रहा,

    अज्ञात हैं अनुभूतियाँ आनन्द है क्या आ रहा?२।।


    लोक की सुख की तुलाओं में समाती हैं नहीं,

    और अभिलाषा मेरी मष्तिष्क से जाती नहीं,

    परिणाम की सम्भावना से फेरता मुख हूँ नहीं,

    युद्ध से पहले पराजय मानता भी मैं नहीं।।३।।


    युद्ध छिडता ही नहीं अवसर मुझे मिलता नहीं,

    अपना पराक्रम झोंक दूँ खुद को समर्पित कर चलूँ।

    दैव ने कैसा रचाया यह मेरा संसार है,

    सार इसमें है बहुत पर सार भी नि:सार है।।४।।


    काल की गति है अनोखी, कौन किस मझधार है,

    आज हूँ जो मैं यहाँ, कल जाने फ़िर किस पार हूँ?

    जो कथायें मौन हैं वो शब्दमाला मांगती,

    और बुद्धि धैर्य धरने के लिये पुचकाराती।।५।।


    और अब इस द्वंद में मैं रोज ही हूँ टूटता।

    कर्म मेरे हाथ से इस द्वंद्व में है छूटता।

    हे विधाता! पुण्यफल मेरा ज़रा आगे करो।

    और विश्रांति ज़रा अब चित्त में मेरे भरो!६!

    निजाक्षर✍✍✍✍✍✍✍

    कुलदीप गौड़ जिज्ञासु

    2 जुलाई 2020



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