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    कुश उखाड़ने की विधि

    कुश उखाड़ने की विधि
    28 August

    सनातन धर्म में कुश का बहुत बड़ा महत्त्व है। स्नान,सन्ध्या, पूजा-पाठ, जप, होम, दान, वेदाध्ययन, पितृकर्म, उपनयन,विवाह आदि संस्कार या अन्य कोई भी यज्ञ- प्रायः सब जगह कुश की किसी न किसी रूप में महत्त्वपूर्ण भूमिका है। 

    कुश का स्वरूप या परिभाषा, 

    कुशा:  काशा यवा दूर्वा उशीराश्च  सकुन्दका:।

    गोधूमा ब्राह्मयो मौञ्जा दश दर्भा: सबल्वजा:।।

    दस प्रकार का कुश बतलाया है। इनमें जो मिल सके उसी का ग्रहण करें। जिस कुशा का मूल सुतीक्ष्ण हो,  अग्रभाग कटा न हो और हरा हो वह देव और पितृ दोनों कार्यों में बर्तने योग्य होती है। उसके लिए अमावस्या को दर्भस्थल में जाकर पूर्व या उत्तर मुख बैठे और कुश उखाड़ने के पूर्व प्रार्थना करे-

    कुशाग्रे वसते रुद्र: कुश मध्ये तु केशव:।

    कुशमूले वसेद् ब्रह्मा कुशान् मे देहि मेदिनी।।

    'विरञ्चिना सहोत्पन्न परमेष्ठिन्निसर्गज।

    नुद सर्वाणि पापानि दर्भ स्वस्तिकरो भव।।

    ऊँ हूँ फट् मंत्र  का उच्चारण करते  कुशा  दाहिने हाथ से उखाड़े। 

    पूजन मे इस कुश का प्रयोग वर्ष पर्यन्त विहित होता है।

    कुश के प्रकार, ग्राह्य व त्याज्य कुश,

    कुश का  पवित्री ,सम्मार्जन, उपयमन, बर्हि(परिस्तरण) , ब्रह्म, विष्टर आदि के रूप में प्रयोग किया जाता है

    कुश के प्रतिनिधि पदार्थ, कुश की उत्पत्ति इत्यादि विषयों पर हमारे शास्त्रों में पर्याप्त विचार हुआ है ।

    यहाँ  हम कुश के उत्पाटन की विधि को जानेंगे । यद्यपि हमारे संस्कृत के प्रायः समस्त विद्वान्  जानते हैं, फिर भी कुछ ऐसे धर्मानुरागी आत्मीय जन हैं, जिन्हें जानने की इच्छा है, उनके लिए प्रस्तुत है।


    यज्ञ अनुष्ठान आदि में  देखा जाता है कि  प्रायः नाई(नापित) , सेवक या जिस किसी व्यक्ति के द्वारा लाये गये   कुश का प्रयोग करते हैं  लोग । यह चिन्तनीय है । कुश कैसे लाया जाता है इसे जाने और यथासम्भव तदनुसार लाकर या मंगाकर प्रयोग करें 

    कुशोत्पाटन (उखाड़ने) की विधि--- 

    प्रातः काल स्नान कर के सफेद वस्त्र पहन कर कुश को उखाड़ना चाहिए ।

    उखाड़ते समय आपका मुख पूर्व दिशा में या उत्तर दिशा में होना चाहिए अर्थात् पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुँह कर के कुश उखाड़ना चाहिए ।

    उखाड़ने से पहले   ॐ का उच्चारण कर कुश का स्पर्श करना चाहिए ।

    स्पर्श करने के बाद  निम्नलिखित श्लोक से प्रार्थना करनी

     चाहिए-

    कुशाग्रे वसते रुद्रःकुशमध्ये तु केशवः।

    कुशमूले वसेद् ब्रह्मा कुशान्मे देहि मेदिनि।।

    विरञ्चिना सहोत्पन्न परमेष्ठिनिसर्जन।

    नुद सर्वाणि पापानि दर्भ!स्वस्तिकरो भव।।

    ( अर्थात्  हे दर्भ ! तुम ब्रह्मा के साथ उत्पन्न हुए हो,  हमारे सारे पापों को दूर करो एवं सदा कल्याण करो । यदि श्लोक बोलने में असमर्थ हों तो भावार्थ का स्मरण अवश्य कर लेना चाहिए)

    प्रार्थना करने के बाद " हुँ फट्" कह कर एक ही झटके में पितृतीर्थ ( अंगूठा तर्जनी के बीच) से  कुश को उखाड़ लेना चाहिए । जितने कुश उखाड़ने हैं उतनी बार " हुँ फट् " का उच्चारण करना चाहिए । इस सन्दर्भ में शौनक ऋषि ने कहा है- 

    शुचौ देशे शुचिर्भूत्वा स्थित्वा पूर्वोत्तरामुखः।

    ओङ्कारेणैव मन्त्रेण कुशान् स्पृष्ट्वा द्विजोत्तमः।।

    विरिञ्चिना सहोत्पन्न परमेष्ठिनिसर्गज।

    नुद सर्वाणि पापानि दर्भ!स्वस्तिकरो भव।।

    इमं मन्त्रं समुच्चार्य ततः पूर्वोत्तरामुखः।

    हुंफट्कारेण मन्त्रेण सकृच्छित्त्वा समुद्धरेत्।।

    स्मृत्यर्थसार में भी कहा है -

    हुँफट्कारेण मन्त्रेण सकृच्छित्त्वा समुद्धरेत्।

    अर्थात् " हुँ फट् कह कर एक ही बार में कुश उखाड़ लें ।

    यदि जड़ मज़बूत हो , एक बार में उखड़ने में सन्देह हो तो खुरपी, खनित्र आदि से जड़ को पहले ही  ढीला कर दें फिर एक झटके में उखाड़ लें । जैसा कि स्मृत्यर्थसार में कहा है-

    पूर्वं तु शिथिलीकृत्य खनित्रेण विचक्षणः।

    आदद्यात् पितृतीर्थेन हुँफट् हुँफट सकृत् सकृत्।।

    कुश कब उखाड़ना चाहिए?

    जिस दिन कुश की आवश्यकता हो उसी दिन प्रातः कुश उखाड़ना चाहिये। अङ्गिरा ऋषि का कथन है-

    अहन्यहनि कर्मार्थं कुशच्छेदः प्रशस्यते ।

    कुशा धृता ये पूर्वत्र योग्याःस्युर्नेतरत्र ते।।

    यदि प्रतिदिन कुशोत्पाटन सम्भव नहीं है तो हर  अमावस्या को कुशोत्पाटन कर लेना चाहिए । अमावस्या को उत्पाटित(उखाड़े गये ) कुश का एक मास तक प्रयोग हो सकता है -

    " मासि मास्याहृता दर्भास्तत्तन्मास्येव चादृताः।।

    यदि हर अमावस्या को भी कुशोत्पाटन सम्भव नहीं है तो भाद्रपद मास की अमावस्या को कुशोत्पाटन कर लेना चाहिए । भाद्रपद मास की  अमावस्या को कुशोत्पाटनीअमावस्या कहते हैं । इस दिन विधिपूर्वक उत्पाटित कुश का प्रयोग एक वर्ष तक कर सकते हैं। हारीत ने  हिमाद्रि में कहा  है-

    मासे नभस्यमावास्या तस्यां दर्भोच्चयो मतः।

    अयातयामास्ते दर्भा विनियोज्याःपुनःपुनः ।।

    मदनरत्न में भी यह वचन प्राप्त है। 

    विष्णु ने कहा है-

    दर्शे श्रावणमासस्य समन्त्रोत्पाटिताःकुशाः।

    अयातयामास्ते दर्भा नियोज्याःस्युःपुनःपुनः।।

    (अमान्तमासगणनानुसार श्रावण कहा है , हमारे यहाँ पूर्णिमान्तमास गणना प्रचलित है तदनुसार भाद्रपद जानना चाहिए)

    किस प्रकार का कुश ग्रहण करना चाहिए इस सन्दर्भ में कहा गया है-

    पथि दर्भाः चितौ दर्भा ये दर्भा यज्ञभूमिषु।

    प्रस्तरासनपिण्डेषु षट् कुशान् परिवर्जयेत्।।

    ब्रह्मयज्ञे च ये दर्भा ये दर्भाःपितृतर्पणे।

    हता मूत्रपुरीषाभ्यां तेषां त्यागो विधीयते।।

    अपूता गर्भिता दर्भा ये च दर्भा नखैःक्षताः।

    क्वथिता अग्निदग्धाश्च कुशान् यत्नेन वर्जयेत्।।

    अर्थात्  मार्ग , श्मशान , यज्ञभूमि, पत्थर, आसन, पिण्डोत्पन्न, गन्दी जगह(जहाँ मल-मूत्र का त्याग हुआ हो) पर उत्पन्न, गर्भित, नखक्षत, क्वथित, पितृतर्पणादि में प्रयुक्त जो पुनः उग आया हो या जला हुआ हो - ऐसे कुश का ग्रहण नहीं करना चाहिए ।

    अर्थात्  जिसका अग्रभाग कटा न हो , जला न हो, गर्भित न  हो , मार्ग या गन्दी जगह आदि में उत्पन्न न हो- ऐसे कुश का ग्रहण करना चाहिए ।

    यदि कुश उपलब्ध नहीं है तो उसके प्रतिनिधि पदार्थ का ग्रहण कर लेना चाहिए । जैसा कि कहा है  -

    कुशाःकाशाःशरा दूर्वा यवगोधूमबल्वजाः।

    सुवर्णं राजतं ताम्रं दश दर्भाः प्रकीर्तिताः।।

    कुशाभावे तु काशाःस्युः काशाःकुशसमाः स्मृताः।

    काशाभावे ग्रहीतव्या अन्ये दर्भा यथोचिताः।। 

    अर्थात् कुश न मिलने पर उसकी जगह काश, शर, दूभ आदि का ग्रहण किया जा सकता है ।

    अतः निष्कर्ष यही है कि यज्ञ आदि में उक्तनियमानुसार   स्वयं या सुयोग्य प्रतिनिधि के द्वारा लाये हुए कुश का ही उपयोग करना चाहिए।

    संकलित✍️✍️✍️✍️✍️✍️



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