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    ह्वाट्सएप न कोई भी कॉल जानूँ वो कौन सा "रौल" जहाँ मैं पहुँच गया।

    ह्वाट्सएप न कोई भी कॉल जानूँ वो कौन सा
    25 December

    कहने को तो उत्तराखंड प्रगतिपथ पर है। लेकिन यहाँ (कामन्दा, नैनीडांडा) प्रगति और पथ दोनों एक दूसरे को पहचानते तक नहीं हैं। दोनों से संवाद किया गया तो पता चला कि इस दशा में दोनों एक दूसरे को किसी की कोरी कल्पना समझ रहे हैं। खैर! कथ्य यह है कि मैं जिस क्षेत्र में रहता हूँ वह आधुनिक भारत/उत्तराखंड का अभिन्न अंग है, और कथित तौर पे 4G के युग में पल बढ़ रहा है। किसी चाटुकार के रिकॉर्ड के अनुसार, लेकिन हक़ीक़त यह है कि यहाँ ऐसे हालात हैं कि लगता है कि "मोबाईल" नामधारी "डिब्बा" गाने बजाने के लिए ही ठीक है, और जो आदतें हमने इस यांत्रिक युग में बना ली हैं, यहाँ उनको तिलांजलि देना ही श्रेयष्कर है। चिट्ठी के ज़माने में लौट चलें। कम से कम लेखकीय क्षमता तो विकसित होगी, शब्द मोती जैसे सुरक्षित तो रहेंगे। लेकिन हमारा समाज मुख्यधारा में कैसे रहे? क्या यहाँ के समाज को हक़ नहीं कि वो भी समाज के बराबर चल सके? वो भी वही, उतनी आसानी से प्राप्त करे जितना समाज का अन्य वर्ग?

    बात यह है कि वर्तमान में जहाँ में सेवारत और निवासरत हूँ वहाँ कोई नेटवर्क नहीं है। एक बीएसएनएल है लेकिन इस कंपनी ने ग्राहकों का जो शोषण यहाँ किया हुआ है वो अत्यन्त दमनकारी है। विकल्प न होने के कारण यहाँ का जनमानस पोर्टिंग सुविधा भी नहीं ले सकता। जनता बहुत जागरूक और पढ़ी लिखी नहीं है, जो सरकार या कंपनी (बीएसएनएल) को चुनौती दे सके, उलाहना दे सके। यहाँ का कामगार हमेशा जुगाड़ू रहा है, यहाँ भी है । वो सारे काम अपने जुगाड़तंत्र से कर लेता है, सरकार को पलट कर कभी जबाब नहीं देता। इसलिये "जब चल रहा है तो सब सही है" वाली धारणा प्रवल है। यहाँ हफ़्तों तक नेटवर्क नहीं रहता कहीं दूर किसी के घर परिवार में कुछ हो गया हो तो यहाँ तो खबर ही नहीं होती, जब समाज ही इस प्रकार का हो गया है तो आप कल्पना कर सकते हैं क्या .......

    मैं अशांति का प्रतीक हूँ, निश्चित ही यहाँ भी कुछ होकर रहेगा, कोशिश है शांति से हो। अन्यथा "क" से कुलदीप तो "क" से क्रांति भी संभव है।☺️☺️☺️☺️☺️

    यह लेख हास्य के छौंके के साथ का  सच है। तदनुसार ही बोध करें। निवेदक- लेखक



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