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    प्रेम क्या है?

    प्रेम क्या है?
    8 July

    लघुलेख लघुप्रयास-


    सभी लोगों को प्यार के विषय मॆं जानने की रुचि होती है। सभी जनना चाहते हैं कि प्यार आखिर है क्या? इस विषय को आधार बनाकर तथा प्रेम को केन्द्रीय बिन्दु मानकर अनेकानेक शास्त्र रचे जा चुके हैं। सम्पूर्ण साहित्याकाश में सबसे ज्यादा प्यार के मेघ ही विचरण कर रहे हैं।

    किसी भी भाषा का साहित्य हो, जितना इस विषय इस लिखा जा चुका है उतना अन्य किसी विषय पर नहीं । इतना होने पर भी आजतक प्यार की कोई परिभाषा निर्धारित नहीं की जा सकी है। 

    तो मित्रों आप कहीं ये न समझ लें कि ये काम मैं करने जा रहा हूं मैं यह स्पष्ट कर दूं कि मै यहां प्यार के सन्दर्भ में महान नाटककार भवभूति का मत प्रस्तुत कर रहा हूं जो उन्होंने अपने प्रसिद्ध नाटक उत्तररामचरितम् में वर्णित किया है। -


    अहेतुः पक्षपातो यस्तस्य नास्ति प्रतिक्रिया

    स हि स्नेहात्मकः तन्तुरन्तर्मर्माणि सीव्यति॥ 


    अन्वयः- अहेतुः यः पक्षपातः तस्य प्रतिक्रिया नास्ति, स हि स्नेहात्मकः तन्तुः (उभयोः) अन्तर्मर्माणि सीव्यति।


    शाब्दिकार्थः- अहेतुः= कारण के बिना, कारणाभावात्, यः पक्षपातः= जो समर्थन (तरफ़दारी इति भाषान्तरम्) तस्य= उस पक्षपात की/का, तरफ़दारी की/का, प्रतिक्रिया= (कोई) कारण (वजह), नास्ति= नहीं होता/होती। सः स्नेहात्मकः= वह स्नेहरूपी, तन्तुः= धागा, (उभयोः=दोनों का) अन्तर्मर्माणि=अन्तर्मर्म को, अन्तःकरण को, सीव्यति= सिल देता है।


    तात्पर्य यह है कि जब कोई हमें वेवजह अच्छा लगने लगता है या बिना किसी स्वार्थ के जब हम किसी का समर्थन करने लगते है, विवेक के धरातल पर वह व्यक्ति चाहे सही हो या गलत हम इसका विचार नही करते इस अवस्था में यदि कोई पूछे तो हम निरुत्तर हो जायेंगे. हम इस पक्षपात का कारण नही बता सकते। (इसीलिए श्लोक में कहा है तस्य नास्ति प्रतिक्रिया ।) क्योंकि हमने यह पक्षपात सोचविचार कर थोड़े ही किया है।

     अतः दोनों के मध्य होने वाला जो प्रेम उसका स्नेहरूपी जो धागा वह दोनों के अन्तःकरण (दिलों) को परस्पर सिल देता है और उनमें तदात्म्य सम्बन्ध हो जाता है। तादात्म्य का अर्थ है- भिन्न होने पर भी अभिन्न होना। प्रेमी प्रेमिका में भी ऎसा ही होता है वस्तुतः वे दोनों भिन्न भिन्न हैं परन्तु उनके अहसास एक हो जाते हैं। तभी तो प्यार करने वाले कहते हैं कि वे दो दिल एक जान हो गये। यहां प्रेमी-प्रेमिका शब्द रूढ नही अपितु यौगिक है। जिसका प्रेम समान्य से सम्बन्ध है।

    यह किसी से भी हो सकता है भाई बहन सगे सम्बन्धी मित्र पशु पक्षी वस्तु आदि। यही सच्चा प्यार है।



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