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    कवितायें

    दुष्कुलपंचकम् (संस्कृत-काव्यं)

    दुष्कुलपंचकम् (संस्कृत-काव्यं)
    2 July

    पिता यस्य प्रलापी स्यात्, भगिनी कलहवर्द्धिनी ।
    सदा हठधियो भ्राता, पतनं तस्य निश्चितम्।।१।।

    यस्य पिता प्रलापी स्यात्, भगिनी कलहवर्द्धिनी (स्यात्), भ्राता सदा हठधिय: (स्यात्) तस्य पतनं निश्चितम् (भवति) ।।१।।
    जिसके पिता प्रलाप करने वाले हों, काम कुछ न करते हों, बहन फूट डालने वाली हो कलह को बढ़ाने वाली हो, भाई हठबुद्धि वाला हो, (हठबुद्धि=जो किसी की न सुने बस वही करे जो खुद सोचा हो, जो सोचा है उस पर सही गलत का विचार न करे, जबकि उसका परिणाम विनाश के रूप में भी प्राप्त हो चुका हो) ऐसे व्यक्ति का पतन निश्चित है।

    माता विहीनो सदनं अथवा अक्षमा हि सा।
    तस्मिन् गेहे सदा पीड़ा विवादो चापि प्राप्यते।।२।।

    (यत्र)सदनं माता विहीन: अथवा हि सा अक्षमा (स्यात्)
    तस्मिन् गेहे सदा पीड़ा (भवति) (तत्र) विवाद: चापि प्राप्यते।।२।।
    जिस घर में माता न हो, जो घर माँ के बिना हो, या माँ हो लेकिन अक्षम हो, उस घर को बहुत कष्ट झेलने पड़ते हैं, ऐसे घर में विवाद भी बहुत देखा जाता है।

    काल: हसति तादृशान् पारिवारिकजनान् प्रति।
    हास: भवति लोके च अत: तज्जन्म निष्फलम्।।३।।

    तादृशान् पारिवारिकजनान् प्रति काल: हसति लोके च हास: भवति अत: तज्जन्म निष्फलम्।।३।।
    ऐसे (जहाँ पिता प्रलापी हो, बहन कलह बढ़ाने वाली हो, भाई अपनी ही चलाने वाला हो, माँ न हो या अक्षम हो (ऐसे)) घर के लोगों पर काल भी दुखी होकर हँसता है, और जग हँसाई भी होती है। इसलिये ऐसे घर में जन्म निष्फल है, ऐसे घर में धर्म निभाते हुए किसी भी पुरुषार्थ का कोई फल नहीं मिलता ।

    ते पुण्यशालिनः सन्ति येषां स्वयुत्साहवर्धकाः।
    दृश्यन्ते चान्यथा लोके स्वजना: गुणघातका:।।४।।
    येषां स्वे उत्साहवर्धका: (सन्ति) ते पुण्यशालिनः सन्ति। अन्यथा च लोके स्वजना: गुणघातका: दृष्यन्ते।।५।।
    जिनके परिजन(परिवारीजन या रिश्तेदार) उत्साहबढ़ाने वाले हैं,व साथ देने वाले हैं, ऐसे मनुष्य निश्चित ही पुण्यशाली हैं, अन्यथा तो इस संसार में संबंधियों को गुणों की हत्या करने वाला ही देखा गया है।

    यत्र दुष्टा रता घाते स्वे तेषां सहयोगिन:।
    तत्र दुखं हरेत् काल: अन्यथा मरणं ध्रुवम्।।५।।

    यत्र दुष्टा घाते रता, स्वे तेषां सहयोगिन: (भवन्ति)
    तत्र काल: एव दुखं हरेत् अन्यथा (तु) मरणं ध्रुवम्।।५।।
    जहाँ दुश्मन आपकी हत्या करना चाहता है, और आपके परिजन किसी न किसी तरह दुश्मन के सहायक ही हो रहे हैं, वहाँ समय ही आपको बचा सकता है, समय अगर अनुकूल हो गया तो बच भी सकते हैं, अन्यथा मरण निश्चित है। ऐसे में भला कोई कहाँ, कैसे बच पाएगा।
    रचनाकार-कुलदीप गौड़ "जिज्ञासु"
    प्रवक्ता (संस्कृत) राजकीय इंटर कॉलेज, कमाण्दा, नैनीडांडा, पौड़ी गढ़वाल



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