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    साहित्यशास्त्र

    क्या होता है जब मनुष्य विपदाओं से घिरा होता है

    क्या होता है जब मनुष्य विपदाओं से घिरा होता है
    20 July

    चित्रण -


     जब व्यक्ति दरिद्र हो जाता है तो उसकी क्या दशा होती है - 


    दारिद्र्यात् पुरुषस्य बान्धवजनो वाक्ये न सन्तिष्ठते

    सत्त्वं हास्यमुपैति शीलशशिनः कान्तिः परिम्लायते ।

    निर्वैरा विमुखीभवन्ति सुहृदः स्फीता भवन्त्यापदः

    पापं कर्म च यत् परैरपि कृतं तत्तस्य सम्भाव्यते ।। 


    व्यक्ति जब धनहीन हो जाता है तो उसकी बातों का प्रभाव भी समाप्त हो जाता है। निर्धन व्यक्ति की बातों पर उसके अपने परिजन भी विश्वास नहीं करते, निर्धन व्यक्ति शीघ्र ही उपहाद का पात्र बन जाता है, उसकी कान्ति फ़ीकी पड़ जाती है, मित्र भी शत्रुवत् व्यवहार करने लगते हैं शीघ्र ही विपदायें आ जाती हैं। किसी दूसरे व्यक्ति द्वारा किये गये अपराध का सन्देह भी लोग निर्धन व्यक्ति पर ही करते है। कितना दुःख सहना पड़ता है निर्धन् व्यक्ति को ।

    पहले तो निर्धनता का बोझ ऊपर से इतनी सारी  विपदायें । हा देव ! तेरा यह कैसा न्याय है।


                                    कुलदीप गौड़ "जिज्ञासु"



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