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    अकेलापन
    8 July

    जिस समय मुझे शीतल छाँव की ज़रुरत थी, एक ऐसे हाथ की ज़रुरत थी जो मेरी पीठ पर थपकी मार कर कहे तेरी मेहनत व्यर्थ नहीं जायेगी, उसी समय मेरे अपनों ने मेरा साथ छोड़ दिया, वैसे मुझे आशा भी न थी। आशा होती तो 28 वसंत ऐसे ही न बीते होते। जानता कौन है सिर्फ तुम और मैं फिर भी गलतफहमी से ही सम्बन्ध की जो डोर थी वह भी तोड़ दी। अच्छा है मुझे मुक्ति मिल गयी। मेरा तो कुछ भी न बिगड़ेगा, जैसा था वैसा ही रहूँगा, जो कर सकता हूँ कर के रहूँगा। पर सवाल ये है कि भविष्य में आँखे कैसे मिलाओगे, थोड़ी सी गैरत ज़रूर रख लेना, अभी की तरह निर्लज्ज न हो जाना।

    मैं अपने कर्तव्य/भूमिका निर्वाह के लिए उत्तरदायी हूँ, न कि कर्तव्यनिर्वाह करने के बाद भी किसी को जबरदस्ती विश्वास दिलाने के लिए। विश्वास करना न करना आपका विवेक है।

    एक बैचैन आत्मा की कलम से✍️✍️✍️✍️✍️✍️



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