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    आचार्य डिग्री विवाद, क्या है उपाय? कितना है समय? क्या हैं संभावनाएं?

    आचार्य डिग्री विवाद, क्या है उपाय? कितना है समय? क्या हैं संभावनाएं?
    8 July

        नमस्कार साथियों आज एक महत्वपूर्ण और गम्भीर विषय के साथ आपके समक्ष उपस्थित हूँ । मैं एक परम्परागत संस्कृत का छात्र हूँ और यथासामर्थ्य इसकी सेवा में लगा रहता हूँ ध्येय यही है कि जितना अर्जित किया है उतना बाँटता चलूँ किन्तु जिस स्तर पर बाँट सकता हूँ नहीं बाँट पा रहा हूँ । क्योंकि परम्परागत संस्कृतशिक्षा को बार बार अग्निपरीक्षा से गुज़रना पड रहा है । वर्तमान में जैसा कि आप सब जानते हैं  कि लोक सेवा आयोग उत्तराखंड हरिद्वार द्वारा आयोजित प्रवक्ता संस्कृत परीक्षा के साक्षात्कार में आचार्य डिग्री धारित व्याकरण साहित्य फलित ज्योतिष न्याय मीमांसा इत्यादि विषयों से स्नातकोत्तर करने वाले छात्रों को अनर्ह घोषित कर दिया गया है। किंतु संस्कृत का छात्र लाचार दिखाई दे रहा है, न कुछ कर पा रहा है न उसके लिए कोई कुछ कर पा रहा है संस्कृत की सभी ज़िम्मेदार संस्थाएं, व अधिकारी इस पर मौन है शिक्षकों में भी भगवानदास आदर्श संस्कृत महाविद्यालय के कुछेक शिक्षकों अतिरिक्त सब मौन हैं। यदि कोई अन्य का नाम लेता भी है तो मेरा उत्तर यही है कि सब व्यवस्था मिल जाने पर/मंच मिल जाने पर तो कोई भी बोल सकता है, बात मंच तैयार करने की है। अख़बारों की राजनीति करने वाले नेता भी जाने कहाँ छुप गए हैं। शायद इस बार फेसबुक से कॉपी पेस्ट करने को नहीं मिला, वैसे मैं नाम लेकर भी कह सकता हूँ लेकिन मैं जानता हूँ सभी मेरे अपने परिजन हैं कोई मेरा दोस्त है कोई बड़ा भाई तो कोई छोटा भाई हम एक परिवार हैं किन्तु यह सबको समझना होगा कि जब मामला गंभीर हो तो व्यर्थ की राजनीति को त्याग कर एक होना ही होगा, (हिंदी प्रवक्ता प्रकरण का अच्छा खासा अनुभव है मुझे) सब इस बात पर विमर्श होना आवश्यक है पहला तो यह कि क्या संस्कृत परंपरागत छात्र के साथ अन्याय हुआ है? दूसरा यह कि यदि अन्याय हुआ है तो न्याय पाने का साधन क्या है? तीसरा यह यदि अन्याय हुआ है तो इस अन्याय को दूर करने की जिम्मेदारी किसकी है? चौथा कि दूर करने की विधि क्या है? क्या किया जाए चौथा यह इस स्थिति को उत्पन्न करने वाली स्थितियां कौन सी हैं?

        सर्वप्रथम तो स्पष्टतः कहा जा सकता है कि संस्कृत के परंपरागत छात्र के साथ पूर्णतः अन्याय हुआ है, फिर भी आयोग का कहना है कि चूंकि नियमावली में संस्कृत विषय से स्नातकोत्तर की बात लिखी गयी है और परंपरागत छात्रों की डिग्रियों में "संस्कृत" शब्द का उल्लेख नहीं है अतः विधिक तौर पर साक्षात्कार में उन्हें लिया जाना संभव नहीं है। इस पर कहना है कि 2015 में जब यही भर्ती आयी थी तो उस समय भी यही नियम थे और तब इन्ही परंपरागत छात्रों को लिया भी गया था और उनकी नियुक्ति भी हुई थी, तब तो उनका अभ्यर्थन निरस्त नहीं किया गया था, अब जब तत्काल में सामान डिग्री वालों का अभ्यर्थन निरस्त नहीं हुआ तो अचानक से आयोग में ऐसा क्या हो गया जो इन्ही डिग्री धारियों को अनर्ह घोषित कर दिया गया? अतः यह सरासर अन्याय है।

    इस न्याय को पाने के साधन न्यायालय, शासन व स्वयं आयोग ही हैं।

    किन्तु समय सबसे बड़ा खिलाड़ी है यदि शीघ्र कुछ न किया गया तो निर्णय हो जाने पर भी हाथ कुछ नहीं आएगा। इस दशा में कोर्ट सरल उपाय नहीं है। उच्च न्यायालय द्वारा आयोग को 8 जुलाई की डेट दी गयी है। और संभवतः 15 जुलाई तक नियुक्ति हो जायेगी इसलिये नियुक्ति हो जाने पर शायद कोर्ट का निर्णय पक्ष में आने पर भी काम न करे। इस दशा में उपाय यही है कि आयोग और शासन पर दबाव बनाया जाय। इसके लिये सभी प्रभावितों को एक होना होगा, ज़िम्मेदार संस्थाओं को दबाव देना होगा, और यह काम जितनी जल्दी होगा तभी अच्छा होगा ।

    https://youtu.be/hEuPwMZyA2o

    अगर आचार्य डिग्री धारकों को न्याय न मिला तो इसका सबसे ज्यादा खामियाजा परंपरागतसंस्कृत संस्थाओं व शिक्षकों को ही झेलना होगा, कौन छात्र आचार्य करना चाहेगा जब उसका भविष्य ही रोजगार के लिए सुरक्षित नहीं होगा तो। संस्कृत संस्थानों कुलसचिवों शिक्षकों को तो सिर्फ वेतन लेने से मतलब है इनके लिए छात्र सिर्फ खिलौना है जब तक इनके नाम पर वेतन मिल रहा है ठीक है वरना क्या जा रहा नया अबोध छात्र को इनके वेतन के लिए आएगा ही ।

    ज़िम्मेदारी अभी उन्ही छात्रों/अभ्यर्थियों की है जो प्रभावित हैं, जिनका अभ्यर्थन निरस्त हुआ है। वे ही सब लोगों को जागरूक करें और सबको लेकर चलें भले ही इसके लिये जनांदोलन करना पड़े। यह एक अवसर भी है ऐसा अवसर बार बार नहीं आएगा, सभी लोगों को इकठ्ठा करना मुश्किल हो जाता है और संस्कृत जगत में तो और भी दुरूह है। जनांदोलन संस्कृत जगत की गन्दगी दूर करने के लिए आवश्यक भी है।



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