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    लोकसेवा आयोग आचार्य डिग्री विवाद

    लोकसेवा आयोग आचार्य डिग्री विवाद
    8 July

    आज चहुंओर सरकार, आयोग और अन्य संस्थानों की आचार्य उपाधि को अनर्ह करने पर भर्त्सना की जा रही है जबकि इसके बीज में संस्कृतज्ञ ही हैं जो चाटुकारिता और स्वार्थ के वशीभूत होकर कभी अपना करणीय नहीं करते, संस्कृत का प्रभावी व्यक्ति कभी मुखर नहीं हुआ है यही कारण है आज तक संस्कृत शिक्षा को जितना छला गया है उतना किसी अन्य को नहीं।

    जब उत्तराखंड संस्कृत विवि से शास्त्री उपाधि प्राप्त छात्रों को  को हिंदी के पदों हेतु नहीं लिया जा रहा था तब यही संस्कृतसेवक ऐसे ही रहा यह सोचकर कि अपना क्या, यही कारण है संस्कृत पर बार बार चोट की जाती रही है क्योंकि हम सब स्वार्थपरायण होकर खुद ही बंटे हुये हैं। कहाँ अपने सामर्थ्य का निवेश करना है जिससे सारी व्यवस्था हितकारी हो यह निर्णयः कर पाने में अक्षम हैं, क्योकि सबका स्वार्थ और अपने को क्या? की भावना बलवती हो उठती है, भर्तृहरि ने ठीक ही कहा है-

    बौद्धारो मत्सरग्रस्ता: प्रभवः स्मयदूषिता: ।

    अबोधोपहताश्चान्ये जीर्णमंगे सुभाषितम्।।

    दरअसल हमें बड़ो के द्वारा सिखाया ही यही जाता है #अपना काम निकालो.........

    कामना यही है सबका आचार्य उपाधि को उचित सम्मान मिले। किन्तु यह तभी संभव है जब जुगाड़बाजी का वायरस निकल जाए।

    यह पहली बार नहीं है जब आचार्य डिग्री पर कुठाराघात हुआ है विगत 3 वर्षों में अनेक बार यह दंश लग चुका है, लेकिन समय साक्षी है कौन कहाँ खड़ा रहा, यही कारण है बार बार मरना पड़ रहा है। ये एक संकेत है अभी भी जाग जाओ वर्ना ऐसे जलन से ताड़पेंगे हम सब कि नासूर बन जायेगी।

    जयतु संस्कृतं जयतु भारतम्



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