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    23-05-2019
    8 July

    वो अफसाना जिसे अंज़ाम तक लाना न हो मुमकिन।

    उसे एक खूबसूरत मोड़ देकर छोड़ना अच्छा।।


    मेरे लेखन के कई मायने हैं, बंधनों में रहते अपनी भावना का पहलू शब्द से बांध दिया जाय, मुमकिन नहीं, किन्तु छुआ अवश्य जा सकता है, और वह छुवन सबको महसूस हो यह भी मुमकिन नहीं, लेकिन प्रश्न बहुत उठते हैं, ख़ुद से भी जूझना पड़ता है। खैर............


    मैं हारा नहीं हूँ, और न मैं कभी हार सकता, अभी तो यह संभावना नहीं, वस्तुतः हार और जीत है क्या? यह परिभाषित होने के बाद ही यह कहा जा सकता है कि मैं हार सकता हूँ या नहीं, लेकिन ये छोड़कर जाने की बात है.......

    मैं कभी चुनौतियों से विमुख नहीं हुआ न होता हूँ, लेकिन जितना सायना होता जा रहा हूँ, उतनी पहुँच बढ़ रही है, उतनी ही बड़ी चुनौतियाँ भी है और अगर आपको आगे बढ़ना है तो आपको इन चुनौतियों का सामना करना होगा, और मैं निर्भय होकर करता भी हूँ किन्तु सम्बन्ध मुझे रोकते हैं। इनके पास इस बात का भी उत्तर नहीं है कि यदि मैं यह न करूँ तो क्या करूँ? कैसे अपने जीवन को उन्नत बनाऊं, मेरी अपनी शक्ति,सामर्थ्य क्या है?  मेरे दिमाग में क्या चल रहा है ............

          संबंधों को मैं अपने अनुसार चला नहीं सकता। मेरी इस संदर्भ में एक सीमा है। हर किसी की होती है, और मैं उस सीमा तक जा चुका, अपना दायित्व निभा चुका, किन्तु जब सम्बन्ध अनावश्यक बाधा बनते हैं तो शांति से........ रहना अच्छा। कोशिश यही कर रहा हूँ पर मुझे घसीटा जा रहा है, समय अनुकूल नहीं है तथापि अनुकूलता की आस में हूँ, केवल समय के।

    सम्बन्ध जब अपनी भूमिका भूल जाते हैं तो केवल विनाश होता है चाहे किसी का हो। भूमिका तय करना ही सम्बन्ध की चुनौती है, और इस चुनौती को सम्बन्ध का जो अंग स्वीकार न करे निश्चित ही वह विनाश की नींव रख रहा है, सम्बन्ध का पूरा ताना-बाना विषमय कर रहा है।

    कुलदीप गौड़ "जिज्ञासु"



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